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वर्तमान कार्य

निरुक्त का वैज्ञानिक भाष्य पूज्य आचार्य  जी  के द्वारा किया जा रहा है।

यह भाष्य वेद एवं ब्राह्मण ग्रन्थों के गम्भीर वैज्ञानिक रहस्योें को खोलने में आधार का कार्य करेगा।

वैदिक विचारधारा, विशेषकर भौतिकी का सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचार किया जा रहा है।

 विश्वविद्यालयों में वैदिक रश्मि सिद्धान्त पर व्याख्यान।

वेदादि शास्त्रों पर लगाये जा रहे मिथ्या आरोपों का सशक्त उत्तर देना।

 जिज्ञासु युवकों की शंकाओं का समाधान।

    1.  ब्राह्मण ग्रन्थों के पश्चात् निरुक्त ही वेद के सर्वाधिक निकट तथा उसे समझने का आधार ग्रन्थ है।

    2. निरुक्त के निर्वचनों के यथार्थ वैज्ञानिक स्वरूप कोे न समझ पाने के कारण इस समय उपलब्ध भाष्यों में से कोई भी भाष्य वेद के यथार्थ एवं वैज्ञानिक स्वरूप को प्रकाशित करने में समर्थ नहीं है।

    3. निरुक्त के निर्वचनों का उपहास न केवल विदेशी भाष्यकारों ने किया है, अपितु कुछ वैदिक विद्वान् भी अपने पाण्डित्य के अहंकारवश कुछ निर्वचनों का उपहास करते देखे जाते हैं।

    4. निरुक्त के यथार्थ विज्ञान के अभाव के कारण ही महान् ज्ञान-विज्ञान के दिग्दर्शक ब्राह्मण ग्रन्थों को आज तक समझा नहीं जा सका है।

    5. निरुक्त के वर्तमान उपलब्ध सभी भाष्यों में नरबलि, स्त्री व पुरुषों का दान-विक्रय एवं त्याग के साथ साथ अश्लीलता के संकेत भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। यहाँ तक कि निरुक्त के प्रसिद्ध एवं प्रामाणिक टीकाकार आचार्य दुर्ग भी इन पापों से बच नहीं पाए हैं। इन्हीं कारणों से अनेक वेद एवं राष्ट्र विरोधी कथित प्रबुद्ध लोग वेदादि शास्त्रों पर निरन्तर तीक्ष्ण प्रहार कर रहे हैं, जिनका उत्तर देने में प्रायः सभी वैदिक विद्वान् स्वयं को असमर्थ पाकर मौन साधने को विवश हैं।

    6. इन सब कारणों से आज कोई भी वैदिक विद्वान् वर्तमान विज्ञान के समक्ष कुछ भी बोलने का साहस नहीं कर पा रहा। इसलिए बाजार में अनेक भाष्यों के उपलब्ध रहते हुए भी आचार्य जी को ऐतरेय ब्राह्मण की भाँति निरुक्त का भी वैज्ञानिक भाष्य करने को विवश होना पड़ा है।

निरुक्त का भाष्य क्यों?
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