आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक 

महर्षि दयानन्द भाष्य

भूः। भुवः। स्वः। तत्। सवितु:। वरेण्यम्। भर्गः। देवस्य। धीमहि।। धियः। यः। नः। प्रचोदयादिति प्रऽचोदयात्।।

पदार्थ- (भूः) कर्मविद्याम् (भुवः) उपासनाविद्याम् (स्वः) ज्ञानविद्याम् (तत्) इन्द्रियैरग्राह्यं परोक्षम् (सवितुः) सकलैश्वर्यप्रदस्येश्वरस्य (वरेण्यम्) स्वीकत्र्तव्यम् (भर्गः) सर्वदुःखप्रणाशकं तेजःस्वरूपम् (देवस्य) कमनीयस्य (धीमहि) ध्यायेम (धियः) प्रज्ञाः (यः) (नः) अस्माकम् (प्रचोदयात्) प्रेरयेत्।।...

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक  

त्वं सूकरस्य दर्दृहि तव दर्दर्तु सूकरः। स्तोतृनिंद्रस्य रायसि किमस्मान्दुच्छुनायसे नि षु स्वप।। (ऋ.7.55.4)

सायणभाष्यम्

हे सारमेय त्वं सूकरस्य वराहस्य।। द्वितीयार्थे षष्ठी।। दर्दृहि। विदारय। सूकरोऽपि तव दर्दर्तु। विदारयतु। युवयोर्नित्यवैरित्वात्। अस्मान्मा दशेत्यर्थः।। स्तोतृनित्यर्धर्चः पूर्वस्यामृचि व्याख्यातः।।...

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक  

एतद्वा उ स्वादीयो यदधिगवं क्षीरं वा मांसं वा तदेव नाश्नीयात्।। 9।। (अथर्व.का. 9, पर्याय-3, सूक्त 6 मं.9)

इस मंत्र पर आचार्य सायण ने भाष्य नहीं किया है।

पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर भाष्य

पदार्थ- एतत् वै उ स्वादीयः = वह जो स्वादयुक्त है यत् अधिगवं क्षीरं वा मांसं वा= जो गौ से प्राप्त होने वाले दूध या अन्य मांसादि पदार्थ हैं तत् एव न आश्नीयात्= उसमें से कोई पदार्थ अतिथि के पूर्व भी न खावे।।9।।...

आचार्य अग्निव्रत नैष्ठिक  

सोशल मीडिया के एक जागरूक पाठक प्रिय तनिष्क अहलूवालिया ने अपने किसी मुस्लिम मित्र द्वारा ऋग्वेद के दो मंत्रों का निम्नानुसार भाष्य मेरे पास भेजा है।

1. अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति सोमान्पिबसि त्वमेषाम्। पचन्ति ते वृषभाँ अत्सि तेषां पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः।। ऋ. 10.28.3...

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