अनुसंधान के उद्देश्य

वैज्ञानिक क्षेत्र

इससे वर्तमान विज्ञान की अनेक अनसुलझी समस्याओं का समाधान करने में अपूर्व मार्गदर्शन मिलेगा। आचार्य जी एवं श्री विशाल आर्य का मत है कि वर्तमान विश्व में भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में स्थापित माने जा रहे अनेक सिद्धान्तों में अनेक न्यूनताएं हैं। इन न्यूनताओं वा अपूर्णताओं के रहते, जो भी टैक्नोलाॅजी का विकास हो रहा है, वह कहीं न कहीं प्राणिजगत् व पर्यावरण को हानि पहुंचा रहा है। वर्तमान विश्व पर्यावरण प्रदूषण के संकट से तो चिन्तित है, परन्तु उसके मूल कारण तक पहुंचने में यह सभ्य वा वैज्ञानिक समाज असमर्थ ही प्रतीत हो रहा है। केवल स्थूल कारणों पर चर्चा एवं उसके निवारण के कुछ उपाय करने मात्र से समस्या का स्थायी एवं बहुआयामी निवारण सम्भव नहीं है। एक रोग की औषधि दूसरे रोग को जन्म दे रही है, ऐसी स्थिति सर्वत्र देखी जा रही है। आज भूमि, जल, वायु, आकाश ही नहीं, अपितु समष्टि मनस्तत्त्व भी प्रदूषित हो रहा है, जिससे न केवल प्राकृतिक प्रकोपों की संख्या व तीव्रता बढ़ रही है, अपितु शरीर व मन में नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होकर नाना प्रकार के अपराध सम्पूर्ण विश्व में बढ़ते जा रहे हैं। स्टीफन हाॅकिंग जैसा विश्वविख्यात भौतिक वैज्ञानिक एक सौ वर्ष पश्चात् इस पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व समाप्त हो जाने की चेतावनी देते संसार से चला गया। कोई नहीं सोच रहा कि इस भयंकर अभिशाप की उत्तरदायी यह वर्तमान टैक्नोलाॅजी, भोगवादी विकास की खतरनाक प्रवृत्ति एवं मांसाहार ही है। अभी तो सभी सुविधा भोगने का सुख लूटने में मस्त हैं, भावी विनाश का जरा भी भय वा भान नहीं है।

हमारा मत है कि वैदिक विज्ञान से सुदूर भविष्य में ऐसी टैक्नोलाॅजी का जन्म हो सकता है, जो पूर्ण निरापद होगी। वैदिक काल में हमारे ऋषियों, देवों, असुरों, गन्धर्वों आदि के पास ऐसी ही निरापद टैक्नोलाॅजी थी, क्योंकि उस समय वैदिक भौतिकी का साम्राज्य था। आज के प्रबुद्ध वर्ग को रामायण व महाभारत की टैक्नोलाॅजी कल्पना प्रतीत होती है। आचार्य जी के भाष्य से उन्हें अपनी भ्रान्ति का अनुभव हो सकेगा।

अध्यात्म क्षेत्र

वैदिक विद्या के प्रतिष्ठित होने से मनुष्य की प्रवृत्ति भोगवाद से हटकर अध्यात्म की ओर होने से टैक्नोलाॅजी की आवश्यकता भी न्यून हो सकेगी। इस थ्योरी से विश्वभर के अध्यात्मवादियों को भी एक नई दिशा मिलेगी। ईश्वर का वास्तविक एवं वैज्ञानिक स्वरूप तथा वह इस सृष्टि का निर्माण, संचालन, प्रलय आदि को कैसे सम्पन्न करता है अर्थात् उसका क्रियाविज्ञान कैसा हैै? यह विशेष रूप से समझा जा सकेगा। इससे संसार के सम्प्रदायों को अपने-2 विचारों की वैज्ञानिक ढंग से समीक्षा स्वयं करने का अवसर मिलेगा, फलस्वरूप मानव एकता एवं विश्वबन्धुत्व की भावना को बल मिलेगा। अवैज्ञानिकता का त्याग एवं वैज्ञानिकता का ग्रहण करने की सब मनुष्यों को प्रेरणा मिलेगी। इससे सम्पूर्ण विश्व वैदिक स्वर्णिम काल की भाँति एक धर्म, एक भाषा एवं एक भावना के मार्ग की ओर प्रवृत्त होगा। आचार्य जी के इस कार्य से साम्प्रदायिक वैमनस्य, आतंकवाद एवं हिंसा की प्रवृत्ति का निरोध करने में आधारभूत सहयोग प्राप्त होगा।

सामाजिक क्षेत्र

वेदादि शास्त्रों के मिथ्या अर्थों के कारण इस विश्व में अनेक सामाजिक समस्याएं यथा - जातिवाद, छूआछूत, नारी-शोषण, साम्प्रदायिकता, मांसाहार, पशुबलि, नरबलि, नशा, यौन उच्छ्रंखलता, अशिक्षा, प्रमाद, अराष्ट्रियता, हिंसा आदि दुर्गुण उत्पन्न हुए वा होते रहे हैं। इस विज्ञान के प्रकाश में आने से वेदादि शास्त्रों का एक ऐसा उच्च वैज्ञानिक स्वरूप प्रकट होगा, जिससे ये सामाजिक एवं साम्प्रदायिक समस्याएं स्वयमेव समूल नष्ट हो सकेंगी। आज देश में कुछ प्रबुद्ध संगठन वेद में आर्यों व दस्युओं के युद्ध की बात करके कथित सवर्णों को विदेशी बताकर देश में गृहयुद्ध का बीजारोपण कर रहे हैं। वेदादि शास्त्रों, ऋषियों, देवों की निन्दा कर रहे हैं, उन्हें आचार्य जी के ग्रन्थ से अपनी अज्ञानता का बोध हो सकेगा एवं वे भी वेद के भक्त बन सकेंगे, साथ ही सामाजिक समरसता का वैज्ञानिक आधार सबको विदित हो सकेगा। संसारभर के मांसाहारी व स्वेच्छाचारिता के पक्षधरों को वैदिक सदाचार व अहिंसा का सुखद एवं वैज्ञानिक स्वरूप विदित हो सकेगा। इससे वर्तमान समाजशास्त्रियों के अन्दर नूतन वैदिक प्रकाश उत्पन्न होगा।

संस्कृत भाषा

इस कार्य से वैदिक संस्कृत भाषा को ईश्वरीय एवं ब्रह्माण्डीय भाषा सिद्ध किया जा सकेगा, जिससे संस्कृत भाषा को विश्व में प्रतिष्ठा मिलेगी। आर्ष विद्या व संस्कृत के गुरुकुलों वा विद्यालयों के अन्दर नूतन स्वाभिमान जगेगा और उन्हें तथा परम्परागत वेदपाठियों को संसार में उच्च सम्मान प्राप्त होने का मार्ग प्रशस्त होगा।

राष्ट्रीयता और इतिहास

यद्यपि वेद ब्रह्माण्ड का ग्रन्थ है, पुनरपि वेदादि शास्त्रों को अब तक इस भूमण्डल पर भारतवर्ष ने ही सर्वाधिक सुरक्षित रखा है, इस कारण वैदिक एवं आर्ष ज्ञान विज्ञान पर भारतवर्ष का ही सर्वाधिक अधिकार सिद्ध होता है। हमारे इस विज्ञान के प्रकाषित होने से भारतवर्ष के पुरातन ज्ञान विज्ञान, संस्कृति, सभ्यता एवं इतिहास को विश्व में प्रतिष्ठा मिलेगी, जिससे भारत अपने जगद्गुरु के पुरातन गौरव को फिर से प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो सकेगा। आज भारतीय इतिहास में अनेक विकृतियां वेदादि शास्त्रों की भाषा व विज्ञान के न समझने के कारण उत्पन्न हुई हैं। वेदादि शास्त्रों में मानव इतिहास को ढूंढने का प्रयास भारतीय इतिहास के प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण है। उधर कुछ महानुभाव अपने मिथ्या पाण्डित्य के प्रदर्शन के लोभ में रामायण, महाभारत जैसे ऐतिहासिक महाकाव्यों की आध्यात्मिक वा वैज्ञानिक व्याख्या करके भारतीय इतिहास को नष्ट करते हुए जाने अनजाने में भारत विरोधी कथित प्रबुद्धों का सहयोग करके भारत का दूरगामी विनाश करने में लगे हैं। इस सम्पूर्ण समस्या का दूरगामी व स्थायी समाधान आचार्य जी के अनुसंधान से हो सकेगा। इससे विश्व के प्रबुद्ध पुरुषों को भारतीय इतिहास, वेद तथा ऋषियों के ग्रन्थों के अध्ययन के प्रति एक नवीन वैज्ञानिक (वस्तुतः सनातन) दृष्टि मिलेगी। सभी विदेशी निष्पक्ष विद्वान् भी स्वयं को ऋषियों की सन्तति कहलाने में गौरव अनुभव करेंगे। वे भारतवर्ष (आर्य्यावर्त) देश को अपना सनातन प्रेरक देश मानने के लिए भी समुद्यत होंगे। भारतीय इतिहास पर अनुसंधान करने वालों को एक नवीन दिशा प्राप्त हो सकेगी, क्योंकि उन्हें प्राचीन कथाओं की सम्भाव्यता व असम्भाव्यता को पहचानने की एक अभूतपूर्व वैज्ञानिक कसौटी प्राप्त हो सकेगी। इस अनुसंधान से भारतीय प्रबुद्धों, जो आज सर्वतः बौद्धिक दासता के अभिशाप से ग्रस्त हैं, में बौद्धिक स्वतंत्रता का अप्रत्याषित शंखनाद गूंजने लगेगा।